रिश्तों मे दुख, नातों मे दुख
घर मे भी दुख, बाहर भी दुख
जीवन के हर मोङ पे बस दुख
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये
कभी किसी की बातें दुखतीं
कहीं पुरानी यादें दुखतीं
रक्त के वो सम्बन्ध खो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये
मन मे जो भी तनाव भरता
जाकर इक कागज़ पे उतरता
कागज़ भी अब बोझ हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये
कभी पुराने लोग थे कहते
बँटने से सुख दुगुना होता
मैने भी था सुखों को बाँटा
पर बँट कर वे लोप हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये
भटक भटक कर मन भी हारा
रहा अकेला मै बेचारा
सपने भी अब स्वयम् सो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये
कोई कहे कर्तव्य मे सुख है
कोई कहे वैराग्य में सुख है
सारे सच अब झूठ हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये
Sunday, January 27, 2008
Monday, January 21, 2008
बरखा
छम छम बरसो झम झम बरसो
रिम झिम बरसो जम कर बरसो
नयनों का जल तक सूख चुका
सावन के मेघों तुम बरसो
प्यासी धरती प्यासे जंगल
प्यासी नदियाँ प्यासे हैं मन
प्यासों की प्यास बुझाने को
लेकर सारा जल धन बरसो
जलती धरती तपते मरुथल
नदियाँ भी भूल गयीं कल कल
मदमस्त पपीहा रहा मचल
उसकी ही खातिर तुम बरसो
घनघोर घटा सावन की छटा
घूंघट ना गगन का पवन हटा
ठंडी सी फुहारें आयी हैं
ओ रे मयूर अब मत तरसो
छम छम बरसो झम झम बरसो
रिम झिम बरसो जम कर बरसो
रिम झिम बरसो जम कर बरसो
नयनों का जल तक सूख चुका
सावन के मेघों तुम बरसो
प्यासी धरती प्यासे जंगल
प्यासी नदियाँ प्यासे हैं मन
प्यासों की प्यास बुझाने को
लेकर सारा जल धन बरसो
जलती धरती तपते मरुथल
नदियाँ भी भूल गयीं कल कल
मदमस्त पपीहा रहा मचल
उसकी ही खातिर तुम बरसो
घनघोर घटा सावन की छटा
घूंघट ना गगन का पवन हटा
ठंडी सी फुहारें आयी हैं
ओ रे मयूर अब मत तरसो
छम छम बरसो झम झम बरसो
रिम झिम बरसो जम कर बरसो
Sunday, December 30, 2007
दिव्य द्रष्टि
एक बार हमने तपस्या की विकट
भगवान जी भी हो गये प्रकट
बोले... हम प्रसन्न हुए भइये
बोल.. तुझको क्या चहिये
हम बोले.. भगवान अंकल
हमे दिव्य द्रष्टि चहिये
भगवान जी बोले. ओ.के. डन ले भइये
पर ये ध्यान रखियो
ऐसा वरदान एक इन्सान नहीं झेल पायेगा
अबे पंगे औरों के होंगे
और बेटा तू जेल जायेगा
दिव्य द्रष्टि ले कर घर आया
बीवी को नदारद पाया,
दिव्य द्रष्टि घुमाई
बीवी पङोसी के संग नज़र आयी
कह रही थी कहाँ आप्-कहाँ वो
मुआँ दो पैसे कमा कर नहीं लाता है
कुछ मांगो तो तपस्या मे लग जाता है
मैने दिव्य द्रष्टि बन्द कर ली
पहले ही झटके ने बुद्धि हर ली
दूसरे दिन दफ्तर पहुँचा
लेकिन दफ्तर मे घुसने से पहले सोचा..
थोङी दिव्य द्रष्टि घुमा लूं
दफ्तर मे अपनी कितनी इज्जत है
पता लगा लूँ
दिव्य द्रष्टि घुमाई
इज्जत लुटती सी नज़र आयी
मेरा प्रिय चपरासी एक बाबू से कह रहा था
लंच होने को आया
और ये साला साहब का बच्चा
अभी तक ना आया
खुद तो ससुरा एक एक बजे तक आता है
और हम दस बजे भी आयें
तो हाजिरी पर क्रास लगाता है
यह देख कर क्रोध से हमारे नथुने फङक उठे
बिगङे हुए बैल से
हम पूरे भङक उठे
गुस्से मे हम घर जाकर सो गये
अपनी ही उधेङबुन मे खो गये
सुबह उठा तो सोचा
कि पङोसी का अखबार ले आऊँ
मुल्क के हाल चाल का पता लगाऊँ
पङोसी ने दरवाज़ा खोला
फौरन मेरा दिल बोला
ज़रा दिव्य द्रष्टि घुमा लूं
इसकी भी थाह पा लूं
दिव्य द्रष्टि घुमाई
असलियत नज़र आयी
पङोसी की बीवी कह रही थी
आ गया सवेरे सवेरे भिखमंगा
एक तो अखबार माँग कर ले जायेगा
ऊपर से फोकट की चाय भी उङायेगा
और प्रत्यक्ष मे आ कर बोली
ये लीजिये भाई साहब
आज का अखबार और
दो मिनट रुकिये प्लीज़
चाय भी है तैयार
मै चुपचाप घर चला आया
बीवी का संदेशा पाया
सुनते हो जी...
मेरी मम्मी की कुतिया खो गयी है
तीन दिन पहले लापता हो गयी है
ज़रा दिव्य द्रष्टि घुमा लो ना
मेरी मम्मी की बेटी समान
कुतिया कहाँ है..
बता दो ना....
मैने भी घरेलू कुत्ते की तरह दुम हिलायी
तत्काल दिव्य द्रष्टि घुमायी
कुतिया दूसरे मुहल्ले के कुत्तों के साथ घूमती नज़र आयी
मैने बीवी को बताया
डार्लिंग खबर निराली है
तुम्हारी माँ जल्दी ही
सास बनने वाली है
धीरे धीरे हमारी दिव्य द्रष्टि की चर्चा आम हो गयी
अमरीकी सरकार को पता चला
तो वो भी परेशान हो गयी
दो अमरीकी बात कर रहे थे..
इन्डिया ने दिव्य द्रष्टि नाम का ह्यूमेन सेटेलाइट बनाया है
अभी अभी न्यूज़ मे आया है
हम तो उसे किडनैप करायेंगे
चांद के पास लटकायेंगे हमने घबराकर दिव्य द्रष्टि का डायरेक्शन बदल दिया
एक पङोसी मुल्क की तरफ रुख किया
उधर तो इरादे और ही खतरनाक थे
बङे ही भयानक, बहुत ही नापाक थे
दो अतंकवादी आपस मे बात कर रहे थे..
हिन्दुस्तान मे एक आइटम आया है
शायद दिव्य द्रष्टि..
कुछ ऐसा नाम बताया है
बस अब उसे ही उठवाना है
अमरीका ने कहाँ कहाँ ऐटम बम्ब छुपा के रक्खे हैं
पता लगाना है
अब बस हम वही बम चुरायेंगे
सारी दुनियाँ को उङायेंगे
यह देख कर तो अपना भेजा खराब हो गया
दिव्य द्रष्टि का वरदान
ज़हरीली शराब हो गया
मै चिल्लाया
हे भगवान जी जल्दी आओ
दिव्य द्रष्टि वापस ले लो
मेरी जान बचाओ
भगवान जी भी तत्काल आये
मुस्कुराये
बोले आ गया ना लाइन पे
पहले नहीं माना
दो चार दिन झेल लिया
तब तूने जाना
अरे मुझे देख..
लाखों सालों से दिव्य द्रष्टि से सारी दुनियाँ को झेल रहा हूँ
फिर भी हँस खेल रहा हूँ
अरे इसी लिये तो मै भगवान हूँ
इसी लिये तो इतना महान हूँ
कहते कहते भगवान दिव्य द्रष्टि वापस ले कर अन्तर्ध्यान हो गये
और हम भी फिर से सामान्य इन्सान हो गये
इसी लिये मै कहता हूँ कि दोस्तों
यथार्थ मे जीना सीखो
ज़िन्दगी क्या है
यही अर्थ सीखो
ज्यादा गहराई में जाओगे
तो बस मेरी तरह ही
दिव्य द्रष्टि होते हुए भी
हमेशा पछताओगे
भगवान जी भी हो गये प्रकट
बोले... हम प्रसन्न हुए भइये
बोल.. तुझको क्या चहिये
हम बोले.. भगवान अंकल
हमे दिव्य द्रष्टि चहिये
भगवान जी बोले. ओ.के. डन ले भइये
पर ये ध्यान रखियो
ऐसा वरदान एक इन्सान नहीं झेल पायेगा
अबे पंगे औरों के होंगे
और बेटा तू जेल जायेगा
दिव्य द्रष्टि ले कर घर आया
बीवी को नदारद पाया,
दिव्य द्रष्टि घुमाई
बीवी पङोसी के संग नज़र आयी
कह रही थी कहाँ आप्-कहाँ वो
मुआँ दो पैसे कमा कर नहीं लाता है
कुछ मांगो तो तपस्या मे लग जाता है
मैने दिव्य द्रष्टि बन्द कर ली
पहले ही झटके ने बुद्धि हर ली
दूसरे दिन दफ्तर पहुँचा
लेकिन दफ्तर मे घुसने से पहले सोचा..
थोङी दिव्य द्रष्टि घुमा लूं
दफ्तर मे अपनी कितनी इज्जत है
पता लगा लूँ
दिव्य द्रष्टि घुमाई
इज्जत लुटती सी नज़र आयी
मेरा प्रिय चपरासी एक बाबू से कह रहा था
लंच होने को आया
और ये साला साहब का बच्चा
अभी तक ना आया
खुद तो ससुरा एक एक बजे तक आता है
और हम दस बजे भी आयें
तो हाजिरी पर क्रास लगाता है
यह देख कर क्रोध से हमारे नथुने फङक उठे
बिगङे हुए बैल से
हम पूरे भङक उठे
गुस्से मे हम घर जाकर सो गये
अपनी ही उधेङबुन मे खो गये
सुबह उठा तो सोचा
कि पङोसी का अखबार ले आऊँ
मुल्क के हाल चाल का पता लगाऊँ
पङोसी ने दरवाज़ा खोला
फौरन मेरा दिल बोला
ज़रा दिव्य द्रष्टि घुमा लूं
इसकी भी थाह पा लूं
दिव्य द्रष्टि घुमाई
असलियत नज़र आयी
पङोसी की बीवी कह रही थी
आ गया सवेरे सवेरे भिखमंगा
एक तो अखबार माँग कर ले जायेगा
ऊपर से फोकट की चाय भी उङायेगा
और प्रत्यक्ष मे आ कर बोली
ये लीजिये भाई साहब
आज का अखबार और
दो मिनट रुकिये प्लीज़
चाय भी है तैयार
मै चुपचाप घर चला आया
बीवी का संदेशा पाया
सुनते हो जी...
मेरी मम्मी की कुतिया खो गयी है
तीन दिन पहले लापता हो गयी है
ज़रा दिव्य द्रष्टि घुमा लो ना
मेरी मम्मी की बेटी समान
कुतिया कहाँ है..
बता दो ना....
मैने भी घरेलू कुत्ते की तरह दुम हिलायी
तत्काल दिव्य द्रष्टि घुमायी
कुतिया दूसरे मुहल्ले के कुत्तों के साथ घूमती नज़र आयी
मैने बीवी को बताया
डार्लिंग खबर निराली है
तुम्हारी माँ जल्दी ही
सास बनने वाली है
धीरे धीरे हमारी दिव्य द्रष्टि की चर्चा आम हो गयी
अमरीकी सरकार को पता चला
तो वो भी परेशान हो गयी
दो अमरीकी बात कर रहे थे..
इन्डिया ने दिव्य द्रष्टि नाम का ह्यूमेन सेटेलाइट बनाया है
अभी अभी न्यूज़ मे आया है
हम तो उसे किडनैप करायेंगे
चांद के पास लटकायेंगे हमने घबराकर दिव्य द्रष्टि का डायरेक्शन बदल दिया
एक पङोसी मुल्क की तरफ रुख किया
उधर तो इरादे और ही खतरनाक थे
बङे ही भयानक, बहुत ही नापाक थे
दो अतंकवादी आपस मे बात कर रहे थे..
हिन्दुस्तान मे एक आइटम आया है
शायद दिव्य द्रष्टि..
कुछ ऐसा नाम बताया है
बस अब उसे ही उठवाना है
अमरीका ने कहाँ कहाँ ऐटम बम्ब छुपा के रक्खे हैं
पता लगाना है
अब बस हम वही बम चुरायेंगे
सारी दुनियाँ को उङायेंगे
यह देख कर तो अपना भेजा खराब हो गया
दिव्य द्रष्टि का वरदान
ज़हरीली शराब हो गया
मै चिल्लाया
हे भगवान जी जल्दी आओ
दिव्य द्रष्टि वापस ले लो
मेरी जान बचाओ
भगवान जी भी तत्काल आये
मुस्कुराये
बोले आ गया ना लाइन पे
पहले नहीं माना
दो चार दिन झेल लिया
तब तूने जाना
अरे मुझे देख..
लाखों सालों से दिव्य द्रष्टि से सारी दुनियाँ को झेल रहा हूँ
फिर भी हँस खेल रहा हूँ
अरे इसी लिये तो मै भगवान हूँ
इसी लिये तो इतना महान हूँ
कहते कहते भगवान दिव्य द्रष्टि वापस ले कर अन्तर्ध्यान हो गये
और हम भी फिर से सामान्य इन्सान हो गये
इसी लिये मै कहता हूँ कि दोस्तों
यथार्थ मे जीना सीखो
ज़िन्दगी क्या है
यही अर्थ सीखो
ज्यादा गहराई में जाओगे
तो बस मेरी तरह ही
दिव्य द्रष्टि होते हुए भी
हमेशा पछताओगे
Tuesday, December 25, 2007
मौत की फाग
तुम लिखते रहो
हुस्नो इश्क़, पर ही शायरी
ज़िन्दा दिली के
हम को मगर, राग चाहिये
यह वक़्त है लो
हाथ मे, मशाल सी कलम
दहशत की चिता
फूँकने को, आग चाहिये
इस होलिका को
मिल के सारे, फूंक देंगे हम
बस दिल मे सब के
थोङी-थोङी, आग चाहिये
जो मारते हैं
बेकसूरों को, बिना वजह
उनके लिये तो
मौत की ही, फाग चाहिये
हुस्नो इश्क़, पर ही शायरी
ज़िन्दा दिली के
हम को मगर, राग चाहिये
यह वक़्त है लो
हाथ मे, मशाल सी कलम
दहशत की चिता
फूँकने को, आग चाहिये
इस होलिका को
मिल के सारे, फूंक देंगे हम
बस दिल मे सब के
थोङी-थोङी, आग चाहिये
जो मारते हैं
बेकसूरों को, बिना वजह
उनके लिये तो
मौत की ही, फाग चाहिये
Friday, December 21, 2007
अमर सुहागन
कारगिल युद्ध मे शहीद जो जवान हुए
उनको नमन कर धन्य यह देश हुआ
गोलियों की बरिशों मे विजय का नाद देख
खुशी और गम का अजीब समावेश हुआ
छलनी छाती को लिये, गर्व से तने सरों मे
आगे बढने के लिये और भी आवेश हुआ
म्रत्यु पूर्व भेजते सन्देश देश नायकों को
सीमा लांघने का हमें, क्यूं नहीं आदेश हुआ
शान से वो लङे, देश हित में न्योछारे प्राण
आज लाश उनकी तिरंगा ओढ सो रही
घर से वो चले थे, जो लौट के ना घर आये
उनकी विदाई उनके घरों से हो रही
कांपते दो बूढे हाथ, अर्थी को थाम कर
पूछते हैं बोलो अब हम कहां जायेंगे
बाट जोहती दो अश्रुपूर्ण नन्हीं आंखें पूछें
मम्मी बतलाओ मेरे पापा कब आयेंगे
नयनों मे अग्नि भर्, कांपते अधर लिये
सिंहनी सी बोली माता, तव निज लाल से
वीर तो अमर होते, वीर मरते नहीं हैं
मारते हैं शत्रु को वो, ढूंढ के पाताल से
आज तेरे पिता आके, बस गये तुझमे हैं
तू भी अब शत्रुओं को देश से भगायेगा
पिता के अधूरे स्वप्न तू ही पूरे करेगा रे
कारगिल क्या तू पाकिस्तान जीत लायेगा
देख ऐसी भावनायें, मन यही कहता है
कोई कुर्बानी अब व्यर्थ नहीं जायेगी
अमर रहेंगे सदा देश के शहीद और
कोई विधवा ना अब विधवा कहायेगी
आज़ादी के सूरज की, लालिमा सिन्दूर बन
मांग ऐसी सिंहनी की, सदा ही सजायेगी
विधवा ना नाम देना, कोई इन्हें भूलवश
अमर सुहागन ये सदा ही कहायेंगी
उनको नमन कर धन्य यह देश हुआ
गोलियों की बरिशों मे विजय का नाद देख
खुशी और गम का अजीब समावेश हुआ
छलनी छाती को लिये, गर्व से तने सरों मे
आगे बढने के लिये और भी आवेश हुआ
म्रत्यु पूर्व भेजते सन्देश देश नायकों को
सीमा लांघने का हमें, क्यूं नहीं आदेश हुआ
शान से वो लङे, देश हित में न्योछारे प्राण
आज लाश उनकी तिरंगा ओढ सो रही
घर से वो चले थे, जो लौट के ना घर आये
उनकी विदाई उनके घरों से हो रही
कांपते दो बूढे हाथ, अर्थी को थाम कर
पूछते हैं बोलो अब हम कहां जायेंगे
बाट जोहती दो अश्रुपूर्ण नन्हीं आंखें पूछें
मम्मी बतलाओ मेरे पापा कब आयेंगे
नयनों मे अग्नि भर्, कांपते अधर लिये
सिंहनी सी बोली माता, तव निज लाल से
वीर तो अमर होते, वीर मरते नहीं हैं
मारते हैं शत्रु को वो, ढूंढ के पाताल से
आज तेरे पिता आके, बस गये तुझमे हैं
तू भी अब शत्रुओं को देश से भगायेगा
पिता के अधूरे स्वप्न तू ही पूरे करेगा रे
कारगिल क्या तू पाकिस्तान जीत लायेगा
देख ऐसी भावनायें, मन यही कहता है
कोई कुर्बानी अब व्यर्थ नहीं जायेगी
अमर रहेंगे सदा देश के शहीद और
कोई विधवा ना अब विधवा कहायेगी
आज़ादी के सूरज की, लालिमा सिन्दूर बन
मांग ऐसी सिंहनी की, सदा ही सजायेगी
विधवा ना नाम देना, कोई इन्हें भूलवश
अमर सुहागन ये सदा ही कहायेंगी
Thursday, December 20, 2007
अपूर्ण कविता
अंकुर सम जन्मे हो तुम,
अब व्रक्ष रूप भी बन जाओगे,
लेकिन जब पतझङ आयेगा
पत्ता-पत्ता झङ जाओगे
जैसे भोर भये दिन चढता
सांझ भये फिर ढल जाता है
जीवन हो तुम एक दिवस के
सांझ के जैसे ढल जाओगे
अब व्रक्ष रूप भी बन जाओगे,
लेकिन जब पतझङ आयेगा
पत्ता-पत्ता झङ जाओगे
जैसे भोर भये दिन चढता
सांझ भये फिर ढल जाता है
जीवन हो तुम एक दिवस के
सांझ के जैसे ढल जाओगे
Tuesday, December 18, 2007
कवि की सरस्वती वन्दना
कवि की सरस्वती वन्दना
ज्ञान की विज्ञान की, जहान की हे बुद्धि देवी
माता शारदे नमन तुझको हज़ार है,
गीत हो या छन्द हो या दोहा हो या श्लोक कोई
सबकी हे स्वामिनी प्रणाम बार बार है
आज दे आशीश ऐसी, कन्ठ हो सुकन्ठ मेरा
वाणी मे हे शरदा नज़र तू ही आये माँ
बाकी सारे कवियों के गले आज बैठ जायें
मेरे सामने कोई कवि ना टिक पाये माँ
मेरे नाम का हो हौवा, वो जो बोलें लगें कौवा
ऐसी कांव कांव सी आवाज़ उन्हें दे दे माँ
मुझे मिलें तालियाँ, बाकी को मिलें गालियाँ
औ मुझे पुष्प हार उनको बुखार दे दे माँ
श्रोता जो ना करे वाह वाह, जले जीभ उसकी
बीच में जो उठे टांग उसकी माँ तोङिये,
तालियाँ बजाये जो ना, दाद खाज खुजली हो,
ऐसे निखट्टू श्रोता को, कभी मत छोङिये
ज्ञान की विज्ञान की, जहान की हे बुद्धि देवी
माता शारदे नमन तुझको हज़ार है,
गीत हो या छन्द हो या दोहा हो या श्लोक कोई
सबकी हे स्वामिनी प्रणाम बार बार है
आज दे आशीश ऐसी, कन्ठ हो सुकन्ठ मेरा
वाणी मे हे शरदा नज़र तू ही आये माँ
बाकी सारे कवियों के गले आज बैठ जायें
मेरे सामने कोई कवि ना टिक पाये माँ
मेरे नाम का हो हौवा, वो जो बोलें लगें कौवा
ऐसी कांव कांव सी आवाज़ उन्हें दे दे माँ
मुझे मिलें तालियाँ, बाकी को मिलें गालियाँ
औ मुझे पुष्प हार उनको बुखार दे दे माँ
श्रोता जो ना करे वाह वाह, जले जीभ उसकी
बीच में जो उठे टांग उसकी माँ तोङिये,
तालियाँ बजाये जो ना, दाद खाज खुजली हो,
ऐसे निखट्टू श्रोता को, कभी मत छोङिये
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