Friday, March 28, 2008

नाथन के नाथ अनाथ हैं हम NATHAN KE NATH ANATH HAIN HUM

नाथन के नाथ अनाथ हैं हम,
फिर आन ना संकट क्यू हरते
कहते हैं दीन दयाल हो तुम,
इस दीन की पीर न क्यूं हरते
क्यूं काम मोरे बिगरे सगरे,
तुम आकर राह दिखा जाओ
सब रिश्ते नाते झूठ हुए,
पितु मातु तुम्हीं हो निभा जाओ जाओ
बस हौंस तुम्हारे नाम की है,
इस नाम से ही सब दुख डरते
नाथन के नाथ अनाथ हैं हम,
फिर आन ना संकट क्यू हरते

जाने क्यूँ???

दिल मे कोई बात नहीं है
कोई भी जज़्बात नहीं है
इन्तज़ार की बात नहीं है
फिर भी तकता राह किसी की

ग़म का कोई नहीं अन्धेरा
नहीं खुशी का कोई सवेरा
ना अरमानों का कोई डेरा
फिर भी तकता राह किसी की

कोई फूल ना खिलने वाला
नहीं कोई भी मिलने वाला
जाम न साक़ी, खाली प्याला
फिर भी तकता राह किसी की

इक तरफा इक़रार है शायद
बिना कहे इज़हार है शायद
हुआ नहीं, पर प्यार है शायद
फिर भी तकता राह किसी की

Tuesday, February 5, 2008

काव्य रेसिपी

एक कटोरी शब्द लो, आधा कप अरमान
डाल के मन के थाल में, साफ करो श्रीमान
साफ करो श्रीमान, दुखों की आग जलाओ
धीमी धीमी आँच पे, इनको खूब पकाओ
इनको खूब पकाओ, प्यार दो चम्मच डालो
नमक आँसुओं का फिर, थोङा यार मिला लो
मिला आँसुओं क नमक, कुछ डालो जज्बात
कुछ डालो मासूमियत, कुछ डालो हालात
कुछ डालो हालात, प्यार से फिर ढक देना
आँखें जब भर आयें, उबलने तब तक देना
उबल जाय जब ये सभी,दिल को कुछ समझाय
खामोशी का आप फिर, तङका देओ लगाय
तङका देओ लगाय, सर्व फिर गरम कराओ
काव्य रेसिपी यही है,मिल कर लुत्फ उठाओ

Friday, February 1, 2008

सीधी बात

चला आजकल दोस्तों,एक नया व्यापार
खोल दुकानें धर्म की, होता कारोबार
होता कारोबार कि लागत ज़ीरो भैया
लोग छुएंगे पैर , बनोगे हीरो भैया
गली गली फिरते यहाँ, कितने नकली सन्त
चलें लक्ज़री कार में, पैसा हुआ अनन्त
पैसा हुआ अनन्त, किसी ने हमें बताया
बाबा जी ने ब्याज पे, कितना माल उठाया
गली गली वो बेचते, जीसस राम रहीम
हम को देते छाछ और, खुद खा जाते क्रीम
खुद खा जाते क्रीम,कि अब तो होश मे आओ
अरे दलालों धर्म के, कुछ तो शरम दिखाओ
गलती है अपनी यहाँ, इनकी क्या औकात
हम ही ईश्वर से नहीं, करते सीधी बात
करते सीधी बात, तो ऐसा हाल ना होता
सन्त माफिया का ये तगङा, जाल ना होता|

Sunday, January 27, 2008

तलाश

रिश्तों मे दुख, नातों मे दुख
घर मे भी दुख, बाहर भी दुख
जीवन के हर मोङ पे बस दुख
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

कभी किसी की बातें दुखतीं
कहीं पुरानी यादें दुखतीं
रक्त के वो सम्बन्ध खो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

मन मे जो भी तनाव भरता
जाकर इक कागज़ पे उतरता
कागज़ भी अब बोझ हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

कभी पुराने लोग थे कहते
बँटने से सुख दुगुना होता
मैने भी था सुखों को बाँटा
पर बँट कर वे लोप हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

भटक भटक कर मन भी हारा
रहा अकेला मै बेचारा
सपने भी अब स्वयम् सो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

कोई कहे कर्तव्य मे सुख है
कोई कहे वैराग्य में सुख है
सारे सच अब झूठ हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

Monday, January 21, 2008

बरखा

छम छम बरसो झम झम बरसो
रिम झिम बरसो जम कर बरसो
नयनों का जल तक सूख चुका
सावन के मेघों तुम बरसो
प्यासी धरती प्यासे जंगल
प्यासी नदियाँ प्यासे हैं मन
प्यासों की प्यास बुझाने को
लेकर सारा जल धन बरसो
जलती धरती तपते मरुथल
नदियाँ भी भूल गयीं कल कल
मदमस्त पपीहा रहा मचल
उसकी ही खातिर तुम बरसो
घनघोर घटा सावन की छटा
घूंघट ना गगन का पवन हटा
ठंडी सी फुहारें आयी हैं
ओ रे मयूर अब मत तरसो
छम छम बरसो झम झम बरसो
रिम झिम बरसो जम कर बरसो

Sunday, December 30, 2007

दिव्य द्रष्टि

एक बार हमने तपस्या की विकट
भगवान जी भी हो गये प्रकट
बोले... हम प्रसन्न हुए भइये
बोल.. तुझको क्या चहिये
हम बोले.. भगवान अंकल
हमे दिव्य द्रष्टि चहिये
भगवान जी बोले. ओ.के. डन ले भइये
पर ये ध्यान रखियो
ऐसा वरदान एक इन्सान नहीं झेल पायेगा
अबे पंगे औरों के होंगे
और बेटा तू जेल जायेगा
दिव्य द्रष्टि ले कर घर आया
बीवी को नदारद पाया,
दिव्य द्रष्टि घुमाई
बीवी पङोसी के संग नज़र आयी
कह रही थी कहाँ आप्-कहाँ वो
मुआँ दो पैसे कमा कर नहीं लाता है
कुछ मांगो तो तपस्या मे लग जाता है
मैने दिव्य द्रष्टि बन्द कर ली
पहले ही झटके ने बुद्धि हर ली
दूसरे दिन दफ्तर पहुँचा
लेकिन दफ्तर मे घुसने से पहले सोचा..
थोङी दिव्य द्रष्टि घुमा लूं
दफ्तर मे अपनी कितनी इज्जत है
पता लगा लूँ
दिव्य द्रष्टि घुमाई
इज्जत लुटती सी नज़र आयी
मेरा प्रिय चपरासी एक बाबू से कह रहा था
लंच होने को आया
और ये साला साहब का बच्चा
अभी तक ना आया
खुद तो ससुरा एक एक बजे तक आता है
और हम दस बजे भी आयें
तो हाजिरी पर क्रास लगाता है
यह देख कर क्रोध से हमारे नथुने फङक उठे
बिगङे हुए बैल से
हम पूरे भङक उठे
गुस्से मे हम घर जाकर सो गये
अपनी ही उधेङबुन मे खो गये
सुबह उठा तो सोचा
कि पङोसी का अखबार ले आऊँ
मुल्क के हाल चाल का पता लगाऊँ
पङोसी ने दरवाज़ा खोला
फौरन मेरा दिल बोला
ज़रा दिव्य द्रष्टि घुमा लूं
इसकी भी थाह पा लूं
दिव्य द्रष्टि घुमाई
असलियत नज़र आयी
पङोसी की बीवी कह रही थी
आ गया सवेरे सवेरे भिखमंगा
एक तो अखबार माँग कर ले जायेगा
ऊपर से फोकट की चाय भी उङायेगा
और प्रत्यक्ष मे आ कर बोली
ये लीजिये भाई साहब
आज का अखबार और
दो मिनट रुकिये प्लीज़
चाय भी है तैयार
मै चुपचाप घर चला आया
बीवी का संदेशा पाया
सुनते हो जी...
मेरी मम्मी की कुतिया खो गयी है
तीन दिन पहले लापता हो गयी है
ज़रा दिव्य द्रष्टि घुमा लो ना
मेरी मम्मी की बेटी समान
कुतिया कहाँ है..
बता दो ना....
मैने भी घरेलू कुत्ते की तरह दुम हिलायी
तत्काल दिव्य द्रष्टि घुमायी
कुतिया दूसरे मुहल्ले के कुत्तों के साथ घूमती नज़र आयी
मैने बीवी को बताया
डार्लिंग खबर निराली है
तुम्हारी माँ जल्दी ही
सास बनने वाली है
धीरे धीरे हमारी दिव्य द्रष्टि की चर्चा आम हो गयी
अमरीकी सरकार को पता चला
तो वो भी परेशान हो गयी
दो अमरीकी बात कर रहे थे..
इन्डिया ने दिव्य द्रष्टि नाम का ह्यूमेन सेटेलाइट बनाया है
अभी अभी न्यूज़ मे आया है
हम तो उसे किडनैप करायेंगे
चांद के पास लटकायेंगे हमने घबराकर दिव्य द्रष्टि का डायरेक्शन बदल दिया
एक पङोसी मुल्क की तरफ रुख किया
उधर तो इरादे और ही खतरनाक थे
बङे ही भयानक, बहुत ही नापाक थे
दो अतंकवादी आपस मे बात कर रहे थे..
हिन्दुस्तान मे एक आइटम आया है
शायद दिव्य द्रष्टि..
कुछ ऐसा नाम बताया है
बस अब उसे ही उठवाना है
अमरीका ने कहाँ कहाँ ऐटम बम्ब छुपा के रक्खे हैं
पता लगाना है
अब बस हम वही बम चुरायेंगे
सारी दुनियाँ को उङायेंगे
यह देख कर तो अपना भेजा खराब हो गया
दिव्य द्रष्टि का वरदान
ज़हरीली शराब हो गया
मै चिल्लाया
हे भगवान जी जल्दी आओ
दिव्य द्रष्टि वापस ले लो
मेरी जान बचाओ
भगवान जी भी तत्काल आये
मुस्कुराये
बोले आ गया ना लाइन पे
पहले नहीं माना
दो चार दिन झेल लिया
तब तूने जाना
अरे मुझे देख..
लाखों सालों से दिव्य द्रष्टि से सारी दुनियाँ को झेल रहा हूँ
फिर भी हँस खेल रहा हूँ
अरे इसी लिये तो मै भगवान हूँ
इसी लिये तो इतना महान हूँ
कहते कहते भगवान दिव्य द्रष्टि वापस ले कर अन्तर्ध्यान हो गये
और हम भी फिर से सामान्य इन्सान हो गये
इसी लिये मै कहता हूँ कि दोस्तों
यथार्थ मे जीना सीखो
ज़िन्दगी क्या है
यही अर्थ सीखो
ज्यादा गहराई में जाओगे
तो बस मेरी तरह ही
दिव्य द्रष्टि होते हुए भी
हमेशा पछताओगे