Thursday, December 13, 2007

कुत्ते के राजनीतिक गुण

अगर है बनना आप को नेता एक महान-कुत्ता बन कर देखिये, एक बार श्रीमान
एक बार श्रीमान, बङे ही निपुण होते हैं-कुत्ते मे नेता के ग्यारह गुण होते हैं
पहला गुण है भौंकना,बिना बात हर रोज़
दूजा गुण है काटना, ज़रा लगे जो चोट, ..................
पौपुलर हो जाओगे-सेफ भी रह पाओगे
तीजा गुण है गली में, रहो आप ही शेर
दूजा नेता आये तो, कर दो उसको ढेर ...................
भौंक के उसे डराओ-दौङ के दूर भगाओ
चौथा गुण है झुन्ड का, चमचे रक्खो साथ
मिले कोई कमज़ोर तो, कर लो दो दो हाथ........
ये चमचे वोट दिलायें-ये चमचे नोट भी लायें
लालच गुण है पाँचवाँ, सदा ये देता साथ
बिस्कुट दे जो आप को, चाटो उसके हाथ .....
काम बनता या ना बनता-फिर भी पुचकारे जनता
छठवाँ गुण है दौङना, हर गाङी के संग
भागेंगे दुश्मन सदा, उङ जायेंगे रंग ................
के दुश्मन डर के रहेंगे-के तुमसे बच के रहेंगे
स्वमिभक्ति गुण सातवां, सबसे यही mahaan.
P.M.तक बन जाओगे, इससे तुम श्रीमान.............
ये भक्ति कर जाओगे-बहुत ऊपर जाओगे
डरना है गुण आठवाँ, चढोगे हरेक पहाङ
खटिया के नीचे घुसो, जब भी सुनो दहाङ ...........
अगर ज़िन्दा ना रहोगे-तो आगे कैसे बढोगे
पूंछ हिलाना गुण नवाँ,पङेगी अच्छी छाप
मन का जब महौल हो, पूंछ हिलाओ आप .............
टिकट भी पा जाओगे-समर्थन भी पाओगे
दसवाँ गुण गुर्राइये, जब भी मूड हो औफ
लोग भगेंगे फालतू, भीङ होयेगी साफ ...........
मुफ्त मे काम ना करना-बस अपनी जेबें भरना
पागलपन गुण ग्यारहवाँ, देता खूब प्रचार
निष्कासन के रोग का, बेस्ट यही उपचार ...........
पार्टी जब भी निकाले-निकालो उसके दिवाले

Sunday, December 2, 2007

प्यास

मोती से कुछ अक्षर होंगे
शब्दों का सागर होगा
शब्दों के सागर मे डूबा
छन्दों का गागर होगा
गागर मे गीतों का पानी
मन की प्यास बुझायेगा
ना जाने कब ऐसा पानी
पनिहारा कवि लायेगा

उलझन

जीवन क्यों तुम बीत रहे हो
व्यर्थ अनर्थ सी बातों में
रात सी काली शंकाओं मे
भाग्य अभाग्य के खातों मे
कल था निर्धन आज धनी मैं
कल का धनी अब निर्धन क्यों हूं
ये रिश्ता है वो रिश्ता है
रिश्तों मे बंध जाता क्यों हूं
अति तनाव के वो क्षण काले
आत्मा तक मे लगते छाले
लेकिन जिनसे तनाव बढता
उनसे ही क्यों लगाव बढता???????
कर्तव्यों मे घिरा हुआ सा
मुक्ति की आशा क्यों करता मै
सबसे निर्भय दिखने वाला
अपने आप से क्यों डरता मै
जीवन भर का जोङ घटाना
शून्य साथ मे ले कर जाना
फिर भी जीवन गणित ना समझा
जाने किन पन्नों मे उलझा
उलझन उलझन उलझन उलझन
जीवन क्या तुम उलझन ही हो
या फिर चिन्ताओं मे डूबे
थके हुए टूटे मन ही हो
अगर तुम्हें कुछ पता लगे तो
तुम ही आ कर के बतलाना
जीवन क्या है-जीवन क्यूं है
जीवन क्योंकर बीत रहा है

नालायक विध्यार्थी की सरस्वती वन्दना

माता शारदे भवानी, ऐसा वरदान दे दे,
हो जाये जुगाङ कुछ, हर इम्तेहान में
फेल हो गया बङी बेज्जती खराब होगी,
बैठना पङेगा मुझे, पान की दुकान मे
एसएसटी-कम्प्यूटर-जीके-मैथ-आर्ट-इंगलिश
हिन्दी-संस्क्रत-साइंस,कुछ नहीं आता है
शेक्सपियर, अकबर, न्यूटन तो मर गये,
स्कूल भूतों का डेरा नज़र आता है
ऐसा कर दे कमाल, आ जाये कोई भूचाल,
जिसमे केवल स्कूल गिर जाये माँ
ना कोई हताहत हो, ना किसी को चोट लगे,
आन्सरों की शीट, मलबे मे दब जाये माँ
यू नू मैया बैटर के, कितनी है टैंशन,
एक्ज़ामों मे छोरियाँ भी गायब हो जाती हैं
मैसेज ना भेजे कोइ, ना ही मिस्ड काल मारे,
फोन भी करो तो हाय फोन न उठाती हैं
मेरी प्रोबलम जैनुअन है माँ तू ही देख,
माँगता हूं तुझसे मै, यही मुझे वर दे
हर साल खेलूं होली चैन से सुकून से माँ,
अगले बरस से एक्ज़ाम बन्द कर दे

मिडिल क्लास स्वीट होम

नील गगन की छाँव मे, नदी किनारे गाँव मे
हम इक घर बनवायेंगे, महलों सा सजवायेंगे
आकांक्षायें बङी-बङी थीं, जेब मगर छोटी सी थी
खर्च अधिक था,धन की कमी थी, बात यही मोटी सी थी
लोन लिया कुछ ज़ेवर बेचा, कुछ जुगाङ से जुटवाया
प्लाट के लायक यारों हमने, धन था इकट्ठा करवाया
पुरखों की कुछ ज़मीन बेची, पोजीशन भई निल यारों
लेकिन कान्स्ट्रक्शन के लायक, भी कर लिया जमा प्यारों
इक अच्छा सा मुहूर्त देखा, नीव का पूजन करवाया
अपने निजी प्लौट मे हमने, पहला पत्थर लगवाया
पहला पत्थर लगवाते ही, खर खर की आवाज़ हुई
कुछ ही क्षणों मे प्लौट के सम्मुख,अफसर जी की कार रुकी
अफसर जी फिर नीचे उतरे, हमने कैम्पा मंगवाया
ठंडा-ठंडा सर्व किया और, प्यार से उनको पिलवाया
पी कर कैम्पा वो गुर्राये, ये सब क्या करवाया है
इस कान्स्ट्रक्शन वर्क का तुमने नक्शा पास कराया है?
रोको इस निर्माण को फौरन, हम इसको तुङवायेंगे
या फिर सारे प्लौट को बन्धु, हम तो सील करायेंगे
हम बोले प्रभु ये ना करना, हम तो मारे जायेंगे
जो तुम थोङी क्रपा दिखा दो, तुम पर वारे जायेंगे
वे बोले यूँ क्रपा ना होती, `सेवा पानी` करवाओ
अपने प्लौट के पेपर ले कर, तुम मेरे दफ्तर आओ
दफ्तर जा कर सैटिंग कर ली, सौदा फाइनल करवाया
रुका हुआ जो काम था मेरा, मैने फिर से लगवाया
लेकिन काम लगाते ही, इक और थी विपदा आन पङी
जैसे पीछे पलट के देखा, पुलिस की जिप्सी द्वार खङी
जिप्सी से दो मामू उतरे, बोले काम को रुकवाओ
फौरन इस जिप्सी में बैठो,या फिर खुद थाने आओ
थाने जा कर सैटिंग कर के, फिर से काम लगाया था
नगर विकास विभाग का बन्दा, दूजे ही दिन आया था
बोला काम को रुकवा दो और्, मै फिर परसों आऊँगा
बात जो मेरी ना मानी तो, मै नोटिस भिजवाऊँगा
उससे भी फिर सैटिंग कर ली, अतिक्रमण वाले आये
आते ही यारों वो हम पर, चिल्लाये और गुर्राये
बोले ये क्या करवाया है, क्या हमको मरवाओगे
ईंटें पटरी पर रखवा कर, क्या सस्पेंड कराओगे
उनसे भी फिर सैटिंग कर ली, सङक पे मलबा पङवाया
रुका हुआ जो काम था मेरा, मैने फिर से लगवाया
जैसे-तैसे काम लगा फिर, लोग बाग कुछ और आये
लेकिन सैटिंग हो जाने पर, निज-निज दफ्तर को धाये
फिर भी यारों रो-धो कर के,कान्स्ट्रक्शन सम्पूर्ण हुआ
आसमान की छाँव मे घर का, सपना मेरा पूर्ण हुआ
लेकिन सपना पूरा करते-करते मै बेहाल हुआ
सब कुछ लगा दिया था उसमें, यारों मै कंगाल हुआ
फिर भी मैने हिम्मत कर के, ग्रह प्रवेश था करवाया
लेकिन घर में घुसते ही बस, हाउस टैक्स वाला आया
बोला प्लौट के पेपर लाओ,असेस्मेन्ट करवानी है
तेरे इस मकान की पुत्तर,नाप-जोख करवानी है
उससे सैटिंग कर ना पाया, जेब तो मेरी खाली थी
बेचन को अब एक चीज़ थी, वो मेरी घरवाली थी
हाथ जोङ कर मै बोला, अहसान भुला ना पाऊँगा
टैक्स सही लगवा देना, पर सेवा ना कर पाऊँगा
फिर कुछ दिन के बाद मेरे घर, इक लम्बा नोटिस आया
घर की क़ीमत से ज्यादा था, ग्रह-कर को मैने पाया
घर बेचा और टैक्स चुकाया, सङक पे झुग्गी पङवाई
चैन से जीवन वहीं पे बीता, शान्ति वहीं मैने पाई

दहकते हाथ

दहकते हाथ पिघलती कलम
काँपते होठ,धधकते नयन
ह्रदय मे उठते सौ तूफान
मन मे बिजली सी कङकती है
खाक हो जाते जब अरमान्
एक कविता तब बनती है

तड़पते शब्द, उबलता खून
दिल में उठता जब कोई जुनून
हर कोई लगता जब अन्जान
आत्मा जलने लगती है
नज़र आयें जब बस शैतान
एक कविता तब बनती है

दफ्न करते करते मुस्कान
ह्रदय जब बन जाता शमशान
ज़िन्दगी जब लगती वीरान
हर ज़मीं मरुथल लगती है
डिगें जब अपनो के ईमान
एक कविता तब बनती है

काव्य स्रजन

कामना व्यथा बने
प्रेम बस कथा बने
भावना का ह्रास हो
टूटता विश्वास हो
प्रेम की चिता तले
हिय मे आग जब जले
जब भी टूट जाता मन
होता काव्य का स्रजन